नेपाल की राजनीति में रोचक मोड़ आता दिख रहा है। सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी में जारी आपसी कलह के बीच वहां फिर से राजशाही लागू करने और देश को हिंदू राष्ट्र बनाने का आंदोलन शुरू हो गया है। इस आंदोलन को देश के कई समूह का समर्थन मिल रहा है।
आंदोलन की तीव्रता को इस बात से समझा जा सकता है कि कोरोना का खतरा होने के बावजूद हजारों लोग रोजाना सड़क पर उतरकर प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रशासन की ओर से अब तक उन्हें रोका नहीं गया है। नेपाल में 2008 में गणतंत्र की स्थापना की गई थी। 12 वर्षों में पहली बार देश के कई बड़े समूह राजशाही और हिंदू राष्ट्र को बहाल करने के लिए सड़कों पर उतर आया है।
नया संविधान के लागू होने के बाद, ओली कैबिनेट में उपप्रधानमंत्री और विदेश मंत्री रह चुके राष्ट्रीय जनता पार्टी के अध्यक्ष कमल थापा का कहना है कि वर्तमान जनाक्रोश पुराना है। थापा ने कहा, ‘2006 के बाद, तत्कालीन संसदीय दलों और विद्रोही माओवादियों के बीच सहमति बन गई थी और इन्होंने मिलकर राजशाही को जबरन हटा दिया।
अब लोगों में गुस्सा राजनीतिक दलों से ज्यादा राजनीतिक व्यवस्था को लेकर है। वे इसका विकल्प तलाश रहे हैं। प्रदर्शनों में कोई केंद्रीकृत शक्ति नहीं है। छोटे-छोटे समूह राजा के पक्ष में नारे लगा रहे हैं। यहां तक कि पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह ने भी यह नहीं कहा है कि राजशाही फिर से लागू हो। लेकिन, वे वर्तमान शासन की आलोचना करते रहे हैं।
उनके निजी सचिव सागर तिमलसीना ने कहा कि पूर्व राजा ज्ञानेंद्र का सड़क विरोध से कोई लेना-देना नहीं है। सड़कों पर कई लोग राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी (आरपीपी) के समर्थक भी हैं। पूर्व सैनिक और पुलिस के जवान भी राजा के पक्ष में बोल रहे हैं।
कई छोटी पार्टियां दे रही हैं समर्थन
आरआरपी के अलावा पूर्व मंत्री केशर बहादुर बिष्ट के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय शक्ति नेपाल भी सड़कों पर है। लेकिन इसका देशव्यापी संगठन नहीं है। बिष्ट पिछले दिनों राष्ट्रीय प्रजातत्र पार्टी में थे। शिव सेना नेपाल एक संगठित समूह है जो राजशाही की बहाली की लगातार वकालत कर रहा है। श्रीश शमशेर राणा का युवा संगठन भी इसके समर्थन में है।
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